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Elderly Care India

डिमेंशिया और बुजुर्गों के लिए क्यूआर कोड और जीपीएस ट्रैकिंग

प्रौद्योगिकी के अपने फायदे हैं, जिनमें से एक डिमेंशिया (Dementia) से पीड़ित लोगों के लिए है।

हिंदुस्तान टाइम्स के एक हालिया लेख के अनुसार: 

"क्यूआर कोड वाले लॉकेट (पेंडेंट) ने कोलाबा पुलिस को एक लापता बच्चे को उसके परिवार से मिलाने में मदद की", मुझे लगता है कि यह कई परिवारों और देखभालकर्ताओं के लिए एक सकारात्मक और उत्साहवर्धक खबर है।

विशेष आवश्यकताओं वाला एक 12 वर्षीय लड़का घर से निकला और वर्ली से कोलाबा जाने वाली बस में बैठ गया, दुर्भाग्यवश वह रास्ता भटक गया। वह न तो अपने परिवार के बारे में कुछ बता पा रहा था और न ही अपनी मंजिल के बारे में। पुलिस ने उसके लॉकेट में लगे क्यूआर कोड (QR Code) को स्कैन किया और उसे उसके परिवार से मिला दिया।

पुलिस ने इसका श्रेय "प्रोजेक्ट चेतना" को दिया, जिसके तहत याददाश्त खोने और डिमेंशिया से पीड़ित लोगों को क्यूआर कोड वाले ऐसे विशेष लॉकेट वितरित किए जाते हैं।

इतनी सरल लेकिन प्रभावी तकनीक 24 वर्षीय डेटा इंजीनियर अक्षय रिडलान द्वारा विकसित की गई है। 

अक्षय के इस नवोन्मेषी समाधान ने एक क्यूआर कोड पेंडेंट विकसित किया है जो अल्जाइमर रोग (Alzheimer's disease), डिमेंशिया, सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) या ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों के भटक जाने की चिंताओं और परेशानियों को दूर करेगा।

बहस का बड़ा मुद्दा यह है कि क्या क्यूआर कोड जीपीएस ट्रैकिंग (GPS Tracking) से अधिक प्रभावी है या दोनों का एक साथ उपयोग किया जाना चाहिए?

जहां एक ओर एजटेक (AgeTech) नए आयाम स्थापित कर रहा है, वहीं दूसरी ओर क्या तकनीक का कोई नकारात्मक पक्ष भी हो सकता है?

  1. क्या इसका उपयोग आपराधिक गतिविधियों के लिए किया जा सकता है?
  2. डिमेंशिया से पीड़ित कितने लोग इस पेंडेंट या डिवाइस को निकाल देते हैं?
  3. बिना अनुमति के लोगों पर ऐसे उपकरण लगाने या बांधने के क्या कानूनी प्रभाव हैं?
  4. भारत में ऐसे उपकरणों के उपयोग को नियंत्रित करने वाले कौन से कानून हैं?

चूँकि इलेक्ट्रॉनिक टैगिंग या इलेक्ट्रॉनिक ट्रैकिंग भारत में अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में है, मेरी राय में यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि एक पुख्ता ढांचा तैयार किया जाए ताकि इस तकनीक का कोई दुरुपयोग न हो और हर कीमत पर संवेदनशील लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

यद्यपि मैं तकनीकी रूप से उतना कुशल नहीं हूँ, फिर भी एक सामान्य व्यक्ति के रूप में कुछ सवाल मेरे मन में कौंधते हैं:

  1. क्या क्यूआर कोड स्कैन होने पर अलार्म ट्रिगर होना चाहिए ताकि परिवार के सदस्यों को एक एसओएस (SOS) अलर्ट मिल जाए कि क्यूआर कोड स्कैन किया गया है?
  2. जहां विकसित देशों में एयर टैग्स (AirTags) लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं, वहीं भारत में उनकी प्रभावशीलता कितनी है?
  3. इलेक्ट्रॉनिक ट्रैकिंग में स्मार्ट टैग्स क्या भूमिका निभा सकते हैं?
  4. हालांकि आरएफआईडी (RFID) समाधानों पर भी विचार किया जा सकता है, लेकिन जहां तक मैं समझता हूँ इस समाधान के साथ कई तकनीकी चुनौतियाँ जुड़ी हैं।

जैसे-जैसे भारतीय वृद्ध देखभाल (Aged Care) क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय मानकों की ओर अग्रसर हो रहा है, मेरा दृढ़ विश्वास है कि बुजुर्गों की देखभाल के इस पूरे क्षेत्र को एक ऐसे दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है जो अगले दशक से भी आगे देख सके।

पंकज मेहरोत्रा