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Elderly Care India

बुजुर्गों के लिए रंग चिकित्सा (Colour Therapy)

वरिष्ठ नागरिक आवास सुविधाओं (Senior Living facilities) को डिजाइन करना किसी छात्र छात्रावास को डिजाइन करने जैसा नहीं है, यह एक जीवंत समुदाय की रचना करने का विज्ञान और कला दोनों है।

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि असिस्टेड लिविंग (Assisted Living) और डिमेंशिया केयर होम्स में रंग कोड (colour codes) का निवासियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, हालांकि विशेष रूप से भारतीय संदर्भ में वरिष्ठ नागरिकों पर इसके विस्तृत और सत्यापन योग्य प्रभावों पर सीमित शोध उपलब्ध है।

बहस का मुख्य बिंदु केवल सार्वभौमिक डिजाइन या निवासियों के कमरों अथवा दरवाजों के रंगों तक सीमित नहीं है, सवाल यह है कि रंग चिकित्सा (Colour Therapy) वास्तव में क्या है?

शोध के अनुसार, क्रोमोथेरेपी (Chromotherapy), जिसे कभी-कभी कलर थेरेपी भी कहा जाता है, रंग प्रबंधन के रूप में प्रकाश का उपयोग है।

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ऑल रिसर्च एजुकेशन एंड साइंटिफिक मेथड्स (IJARESM) में प्रकाशित डॉ. राकेश गुप्ता का संलग्न लेख "कलर थेरेपी इन मेंटल हेल्थ एंड वेल बीइंग" (Color Therapy in Mental Health and Well Being) एक रोचक और ज्ञानवर्धक अध्ययन है।

इस लेख के अनुसार, रंगों का हम पर गहरा प्रभाव पड़ता है, रंग मन की एक विशेष अवस्था को स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। 

कलर थेरेपी इस धारणा पर आधारित है कि विभिन्न रंग लोगों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करते हैं। 

कुछ रंगों को उत्साहवर्धक माना जाता है, जबकि अन्य शांत करने वाले हो सकते हैं, और इसलिए, रंग व्यक्ति के ऊर्जा स्तर, मनोदशा (mood), भूख, भावनाओं और यहाँ तक कि निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकते हैं। 

शायद इसका अर्थ यह है कि रंग और प्रकाश व्यवस्था (अर्थात रंग का एक प्रकाशित रूप) विभिन्न प्रकार की बीमारियों से निपटने में उपयोगी उपचारात्मक साधन बन सकते हैं।

कलर थेरेपी के बारे में यह सुझाव दिया गया है (हालांकि यह पूरी तरह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ है) कि यह शैक्षणिक प्रदर्शन, आक्रामक/शत्रुतापूर्ण व्यवहार, अस्थमा, अटेंशन-डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD), रक्तचाप (blood pressure), ब्रोंकाइटिस, डिस्लेक्सिया और सीखने की अक्षमताओं, खेल प्रदर्शन में सुधार, मिर्गी (epilepsy), अनिद्रा (insomnia), सुस्ती, फेफड़ों के कैंसर, माइग्रेन, मांसपेशियों को आराम, जेल सुधार, तनाव, गर्भाशय फाइब्रॉएड और दृष्टि विकारों पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।

रंगों के प्रतिकूल प्रभाव भी हो सकते हैं। एपिलेप्सी फाउंडेशन की रिपोर्ट है कि मिर्गी से पीड़ित लगभग 3% लोगों को फोटोसेंसिटिव एपिलेप्सी (photosensitive epilepsy) होती है, जिसमें एक निश्चित तीव्रता की चमकती रोशनी या विशिष्ट दृश्य पैटर्न के संपर्क में आने से दौरे पड़ सकते हैं।

मेरी राय में, भारत में वरिष्ठ नागरिकों की भलाई के लिए रंग कोड के उचित उपयोग पर विस्तार से शोध किए जाने की आवश्यकता है।

संबंधित मंत्रालय द्वारा विस्तृत मानक और दिशानिर्देश जारी किए जाने चाहिए, जिन्हें सीनियर लिविंग परियोजनाओं के डिजाइन दिशानिर्देशों में शामिल किया जाना चाहिए और इसे निवासियों की उपचारात्मक गतिविधियों जैसे आर्ट थेरेपी, संगीत थेरेपी आदि के एक भाग के रूप में भी शामिल किया जाना चाहिए।

दस्तावेज़ यहाँ डाउनलोड किया जा सकता है (Color Therapy in Mental Health and Well Being) या नीचे पढ़ा जा सकता है