इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि भारत धर्मों, आस्थाओं, संस्कृतियों, आध्यात्मिकता और तौर-तरीकों के मामले में दुनिया का सबसे विविधतापूर्ण देश है।
यह विविधता हमारे खान-पान की आदतों, जीवनशैली, सांस्कृतिक मान्यताओं और आध्यात्मिक दृष्टिकोण में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
बहस का मुख्य बिंदु ऐसी विविध संस्कृतियों के मेल के फायदे या नुकसान के बारे में नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि यह वरिष्ठ नागरिक देखभाल (सीनियर केयर) क्षेत्र को कैसे प्रभावित करता है?
सामाजिक रूप से विकसित देशों में धर्म और आस्था पर आधारित देखभाल (Caregiving) सबसे आगे रही है, लेकिन दुर्भाग्य से भारत में हम अभी भी वरिष्ठ नागरिकों की जरूरतों को पूरा करने के लिए दस्तावेजी मानकों और दिशानिर्देशों से काफी दूर हैं।
जैन मुख्य रूप से शाकाहारी हैं, बंगाली मुख्य रूप से मांसाहारी हैं, कुछ लोग कुछ खास दिनों में मांसाहार नहीं खाते आदि।
कुछ लोग लकड़ी की चिता पर अंतिम संस्कार करवाना चाहते हैं, कुछ दफनाया जाना चाहते हैं, कुछ पारसी टावर ऑफ साइलेंस (दखमा) में अंतिम संस्कार की परंपरा का पालन करते हैं आदि।
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, यह अनिवार्य है कि एल्डरकेयर सेवाओं को इस तरह से डिजाइन किया जाए कि जीवन के सभी क्षेत्रों के लोगों को विशिष्ट व्यक्तियों के रूप में देखा जाए और उन्हें उचित व्यक्ति-केंद्रित देखभाल (Person-centered care) प्रदान की जाए।
क्वींसलैंड हेल्थ द्वारा तैयार किया गया संलग्न दस्तावेज़, "हेल्थ केयर प्रोवाइडर्स हैंडबुक ऑन हिंदू पेशेंट्स" (Health Care Providers’ Handbook on Hindu Patients), हिंदू रोगियों की देखभाल करने के तरीके पर एक बेहतरीन अध्ययन सामग्री है।
बहस का एक अन्य बिंदु यह भी है कि यदि ऑस्ट्रेलिया जैसे देश में हिंदू रोगियों की देखभाल के संबंध में दिशानिर्देश हो सकते हैं, तो भारत में ऐसे दिशानिर्देश क्यों नहीं हैं?
ऑस्ट्रेलियाई सरकार 'एल्डरली केयर इंडिया' वेबसाइट का समर्थन या अनुशंसा नहीं करती है।
दस्तावेज़ को वेबसाइट https://www.health.qld.gov.au/ पर देखा जा सकता है या यहाँ डाउनलोड किया जा सकता है (Health Care Providers’ Handbook on Hindu Patients by Queensland Health) या नीचे पढ़ा जा सकता है