आत्महत्या का प्रयास पलक झपकते ही हो जाता है, लेकिन वास्तविक कदम उठाने से पहले इसके लक्षण अंदर ही अंदर सुलगते रहते हैं। अपना जीवन समाप्त करना कोई आसान निर्णय नहीं होता, लेकिन दुर्भाग्य से यह जीवन का एक दुखद पहलू है।
भारत में 2016 के एक अध्ययन से पता चलता है कि 10-20% बुजुर्ग मानसिक एकाकीपन (mental desolation) से पीड़ित हैं, जिसका अर्थ है कि उन बुजुर्गों में स्वस्थ भावनात्मक और सामाजिक बातचीत की कमी है जो समग्र कल्याण के लिए आवश्यक है।
भारत में आत्महत्या एक संवेदनशील विषय है और इसे अक्सर एक सामाजिक कलंक के रूप में देखा जाता है। इसी वजह से प्रभावित व्यक्ति के परिजन आत्महत्या के कारणों पर खुलकर बात नहीं करते हैं।
भारत में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा एकत्र किए गए आत्महत्या के आंकड़ों में बुढ़ापे में होने वाली आत्महत्याओं के कारणों को अलग से प्रकाशित नहीं किया जाता है, जो इस विषय को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन हो सकता है।
अवनिष पटेल के एक अध्ययन से संकेत मिलता है कि वृद्धावस्था में आत्महत्या के लिए विभिन्न कारक जिम्मेदार होते हैं, जैसे परिवार में दुर्व्यवहार, पुरानी बीमारियाँ, अवसाद (डिप्रेशन), गरीबी और सामाजिक उपेक्षा, जो बुजुर्गों में आत्महत्या करने की भावना को जन्म देते हैं।
शोध के आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश आत्महत्याएं (28.33%) पुरानी बीमारियों के कारण होती हैं, इसके बाद कई अन्य कारण हैं, जैसे अवसाद (21.67%), परिवार में दुर्व्यवहार (18.33%), गरीबी (16.67%), और सामाजिक बहिष्कार (15.00%)।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2016 से 2020 के बीच केरल में करीब 10,000 बुजुर्गों की आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए। केरल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यह भी बताता है कि राज्य में चार वर्षों में 7,148 बुजुर्ग पुरुषों और 2,460 महिलाओं ने आत्महत्या की।
अविनाश डी सूसा लिखते हैं कि बुजुर्गों में उम्र बढ़ने के साथ आत्महत्या की दर बढ़ती जाती है और यह 80 वर्ष से अधिक आयु के सबसे वृद्ध लोगों में सबसे अधिक होती है। 85 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों में आत्महत्या की दर सामान्य आबादी की तुलना में 5-6 गुना अधिक होती है।
बिस्तर पर पड़े गंभीर रूप से बीमार रोगियों और बुजुर्गों में डिमेंशिया (मनोभ्रंश) के मामलों में भी आत्महत्या की खबरें आई हैं। जो बुजुर्ग अकेले हैं, विधवा/विधुर हैं, तलाकशुदा हैं और केयर होम में रहते हैं, उनके द्वारा विवाहित लोगों की तुलना में आत्महत्या का प्रयास करने की संभावना अधिक होती है।
जीवनसाथी की मृत्यु के बाद पहले 24 महीनों में और कैंसर या पुरानी बीमारियों के असहनीय दर्द के कारण आत्महत्या का जोखिम सबसे अधिक होता है।
एक तरफ विकसित सामाजिक अर्थव्यवस्थाओं में आत्महत्या की रोकथाम पर अच्छी तरह से परिभाषित दिशानिर्देश और रणनीतियाँ हैं, लेकिन दुर्भाग्य से बुजुर्गों के लिए सामाजिक देखभाल भारत की मजबूत कड़ी नहीं है।
मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या की रोकथाम पर सभी हितधारकों का प्रशिक्षण आत्मघाती व्यवहार की पहचान बढ़ाने और उचित रेफरल व उपचार सुनिश्चित करने के सबसे प्रभावी तरीकों में से एक हो सकता है।
हमारे सिस्टम में अभी भी व्यावहारिक और प्रत्यक्ष दृष्टिकोण की कमी है, जिस पर तत्काल राष्ट्रीय ध्यान देने की आवश्यकता है।
अमेरिकी स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग द्वारा 2011 में प्रकाशित "प्रमोटिंग इमोशनल हेल्थ एंड प्रिवेंटिंग सुसाइड: ए टूलकिट फॉर सीनियर लिविंग कम्युनिटीज" (Promoting Emotional Health and Preventing Suicide: A Toolkit for Senior Living Communities) इस महत्वपूर्ण हस्तक्षेप क्षेत्र पर एक अच्छा संसाधन है।
दस्तावेज़ को वेबसाइट https://www.samhsa.gov/ पर देखा जा सकता है या यहाँ डाउनलोड किया जा सकता है (Promoting Emotional Health and Preventing Suicide) या नीचे पढ़ा जा सकता है