भारत में वृद्ध देखभाल (Aged Care) क्षेत्र धीरे-धीरे एक फूल की तरह खिल रहा है, और यह वह समय है जब सभी उद्योग पेशेवरों और संबंधित हितधारकों को ज्ञान साझा करने के रूप में पोषण प्रदान करने की आवश्यकता है। चूंकि एक पेशेवर क्षेत्र के रूप में सीनियर केयर अपेक्षाकृत नया है, इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि परिपक्व सामाजिक अर्थव्यवस्थाओं के समय की कसौटी पर परखे गए मानकों और दिशानिर्देशों का संदर्भ लिया जाए।
मैं दुनिया भर की उन अच्छी प्रथाओं को उजागर करने का प्रयास करूंगा जिनका संबंधित उद्योग के नेताओं द्वारा मूल्यांकन किया जा सके और इस विषय को सरकारी प्रतिनिधियों के समक्ष उठाया जा सके। ऐसे महत्वपूर्ण अधिनियमों की आवश्यकता है जिनका वृद्ध देखभाल क्षेत्र पर दीर्घकालिक और सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
मानसिक क्षमता अधिनियम 2005 (Mental Capacity Act 2005), जो इंग्लैंड और वेल्स को कवर करता है, उन लोगों के लिए एक वैधानिक ढांचा प्रदान करता है जिनमें स्वयं निर्णय लेने की क्षमता नहीं है, या जिनमें क्षमता है और वे ऐसे समय के लिए तैयारी करना चाहते हैं जब भविष्य में उनमें क्षमता की कमी हो सकती है। यह निर्धारित करता है कि कौन निर्णय ले सकता है, किन परिस्थितियों में, और उन्हें इसके लिए क्या प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
मानसिक क्षमता अधिनियम 2005 द्वारा प्रदान किए गए कानूनी ढांचे को आचार संहिता (Code of Practice) द्वारा समर्थन प्राप्त है, जो यह मार्गदर्शन और जानकारी प्रदान करती है कि यह अधिनियम व्यवहार में कैसे काम करता है। इस आचार संहिता का वैधानिक बल है, जिसका अर्थ है कि कुछ श्रेणियों के लोगों का यह कानूनी कर्तव्य है कि वे उन वयस्कों के साथ काम करते समय या उनकी देखभाल करते समय इसका ध्यान रखें जिनमें स्वयं निर्णय लेने की क्षमता का अभाव हो सकता है।
आचार संहिता का उपयोग कैसे किया जाना चाहिए?
आचार संहिता ऐसे किसी भी व्यक्ति को मार्गदर्शन प्रदान करती है जो ऐसे वयस्कों के साथ काम कर रहा है और/या उनकी देखभाल कर रहा है जिनमें विशेष निर्णय लेने की क्षमता नहीं हो सकती है। यह उन व्यक्तियों की ओर से कार्य करते समय या निर्णय लेते समय उनकी जिम्मेदारियों का वर्णन करती है जिनमें स्वयं कार्य करने या निर्णय लेने की क्षमता नहीं है। विशेष रूप से, आचार संहिता उन लोगों पर ध्यान केंद्रित करती है जिनका किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति देखभाल का कर्तव्य है जो प्रदान की जा रही देखभाल पर सहमति देने में असमर्थ है।
सहमति देने की क्षमता के संबंध में वैधानिक सिद्धांत। अधिनियम पांच वैधानिक सिद्धांतों को निर्धारित करता है:
- किसी व्यक्ति को तब तक सक्षम माना जाना चाहिए जब तक कि यह स्थापित न हो जाए कि उसमें निर्णय लेने की क्षमता का अभाव है।
- किसी व्यक्ति को तब तक निर्णय लेने में असमर्थ नहीं माना जाना चाहिए जब तक कि उसे निर्णय लेने में सहायता करने के सभी व्यावहारिक कदम असफल न हो जाएं।
- किसी व्यक्ति को केवल इसलिए निर्णय लेने में असमर्थ नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि वह कोई अविवेकपूर्ण (unwise) निर्णय लेता है।
- इस अधिनियम के तहत क्षमताहीन व्यक्ति के लिए या उसकी ओर से किया गया कोई भी कार्य या लिया गया निर्णय उसके सर्वोत्तम हित (best interests) में किया जाना चाहिए।
- कार्य करने या निर्णय लेने से पहले इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि जिस उद्देश्य के लिए इसकी आवश्यकता है, क्या उसे ऐसे तरीके से भी उतनी ही प्रभावशीलता से प्राप्त किया जा सकता है जो व्यक्ति के अधिकारों और कार्य करने की स्वतंत्रता पर कम प्रतिबंध लगाता हो।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवा अधिनियम, 2017 (The Mental Healthcare Act, 2017) का भी इसके साथ संदर्भ लिया जा सकता है।
मानसिक क्षमता अधिनियम 2005 दस्तावेज़ को यहाँ डाउनलोड किया जा सकता है या नीचे देखा जा सकता है