ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ संतानों ने अपने माता-पिता को बेसहारा छोड़ दिया है। इस तरह के बच्चों का सामान्य चलन अपने माता-पिता को धार्मिक स्थलों के बाहर, वृद्धाश्रमों के बाहर या हवाई अड्डों/रेलवे स्टेशनों पर छोड़ देना होता है। ये मामले दुर्लभ नहीं हैं बल्कि कड़वी सच्चाई हैं।
यह सुनिश्चित करने के लिए कि ऐसे मामले न हों, 2007 में एक अधिनियम पारित किया गया था। यह अधिनियम कानून इसलिए बना क्योंकि बुजुर्गों की भलाई सुनिश्चित करने के लिए सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा। इस अधिनियम में कुछ संशोधन भी प्रक्रियाधीन हैं।
यह अधिनियम मुख्य रूप से कहता है कि संतानों की अपने माता-पिता के प्रति कुछ जिम्मेदारियाँ हैं जिनका पालन किया जाना आवश्यक है। साथ ही, यदि कोई व्यक्ति किसी निःसंतान वरिष्ठ नागरिक का कानूनी उत्तराधिकारी है, तो उस बुजुर्ग व्यक्ति की देखभाल करने की जिम्मेदारी भी उसकी होती है।
यद्यपि अधिकांश लोग इस अधिनियम से अवगत होंगे, लेकिन एक बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जो अपने अधिकारों से अनभिज्ञ है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
यह अधिनियम उन बुजुर्गों के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकता है जो घरेलू समस्याओं का सामना कर रहे हैं और उन्हें अपने बच्चों पर निर्भर रहना पड़ता है।
दस्तावेज़ 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम' यहाँ डाउनलोड किया जा सकता है या नीचे देखा जा सकता है